राजतंत्र

संविधान के लागू होते ही राजतंत्र की जगह लोकतंत्र ने बना ली, लोकतंत्र को मजबूत करने का जिम्मा उन शिक्षाविदों को सौंपा जाता है, जो बच्चों के बालपनें में ही एक बात ठूस ठूस कर भरते है कि राजाओं ने आम जनता पर अत्याचार किये उन्होंने ही कमजोर वर्ग और गरीबों को हमेशा से दबाया, कुचला।

नाटक और रंगमंच की दुनियां में राजा को विलेन दिखाया गया ताकि राजाओं और जनता का दिली नाता टूट जाये। साहित्यकारों ने भी राजतंत्र को काली कलम से लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रही कमी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता ने पूरी कर ली। कुल मिलाकर सुनियोजित तरीके से राजपरिवारों को हाशिये पर लाने की सभी कोशिशें हुई ।

उधर लोकतंत्र में एक नेता राजा की जगह लेने के लिए 10-20 करोड़ खर्च कर चुनाव लड़ते है, सोशल मीडिया पर एक बड़ी कंपनी को हायर करते है, जो अच्छे ग्राफिक्स, फ़ोटो बनाकर जनता तक पहुंचाती है, जिससे जनता से जुड़ा जा सके। फिर एक पीआर टीम भी रखते है जो नेताजी को जनता से सीधे जोड़े रखने का ठेका लेती है। वही नेता घर से बाहर किसी छोटे काम को भी निकले तो कल के अखबार की खबर अख्तियार कर लेती है। राजनीति का ये खेल एक आम आदमी के चारों ओर इतना शोर शराबा करता है ताकि वो नेता राजा की जगह ले लें।

लेकिन 70 वर्षों से चल रही तमाम कोशिशों के बाद जब एक राजा दुनियां से विदा लेता है तो आधा शहर जाम हो जाता है, कोरोना जैसी महामारी के चलते हुए हजारों की संख्या में उमड़ता जनसैलाब बताता है कि हमारा राजा और राजतंत्र अमर है, ये लोकतंत्र कभी भी राजतंत्र की जगह नहीं ले सकता।

एक नजरिया

पिछले दिनों कुछ नेताओं ने कोरोना मरीजों को बेड, रेमडेसीविर इंजेक्शन, प्लाज्मा इत्यादि पहुंचा कर सुर्खियां बटोरी जो काफी हद तक डिजर्व भी करते हैं। नेताओं द्वारा बेड दिलाने के नाम पर पहले दिन से ही एक प्रश्न उठ रहा था कि जिस हॉस्पिटल में थोड़ी देर पहले बेड उपलब्ध नहीं था, उसी हॉस्पिटल में नेताजी के एक कॉल से बेड कैसे उपलब्ध हो जाता है।
नेताओं ने बहुत सारे अस्पतालों में अपने रिलेटिव और समर्थकों के लिए बेड रिजर्व रखे वहीं कुछ नेताओं ने सोशल मीडिया पर अपनी छवि चमकाने के लिए कोरोना मरीजों को पहले से रिजर्व रखे बेड उपलब्ध करवाए। ये सभी कार्य कहीं न कहीं अनैतिक थे इससे गरीबों और उन लोगों का हक़ मारा गया जिनकी पहुंच बड़े नेताओं तक नहीं थी।
कोटा शहर जैसे सैकड़ों मामले हुए होंगे जहां बेड के उपलब्ध होते हुए भी नेताओं के दबाव के कारण अस्पताल प्रशासन मरीजों को बेड नहीं दे पाए और मरीजों ने दम तोड़ दिया। मरीजों को बेड उपलब्ध करवाकर सुर्खियां बटोरने वाले युवा मोर्चा के पदाधिकारी और बड़े नेता बेड के होते भी नहीं मिलने से होने वाली मौतों के जिम्मेदार है।

गाँव की राजनीति की रपटीली राहें

गाँव की राजनीति की रपटीली राहों पर एक नजर डाले तो वर्तमान राजनीति उन्हीं गहरी खाइयों से गुजर रही है जो पिछले कुछ दशकों से जूझती रही है, वही ईर्ष्या, वही टाँगखिंचाई, वही पाड़ावाद बस बदला है तो सिर्फ सोशल प्लेटफॉर्म पर लोगों की पहुँच।

ये राजनीति उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के मध्य में सिमट के रह गयी है और ग्रामवासी इन ध्रुवों के बीच पड़ने वाले पृथ्वी के गोल चक्करों में फँस गए है। यदि कोई सच्ची आवाज उठाता भी है तो उसे संकुचित विचारकों द्वारा जूठा फरेबी साबित किया जाता है। वहीं कुछ लोग जूठ को सच्च और सच्च को जूठ व राजनीतिक रंग में तब्दील करने की जुगत में बैठे रहते है।

विकास के मुद्दों पर सभी अपने अपने विचार व सुझाव प्रकट करते है, गाँव की धरोहरों को सहेजने की बातें करते है। विकास के नाम पर बने ग्रुप पिछले 3-4 सालों तक ग्रुप में ही सिमटकर रह गए है। धरोहरों के विकास के लिए आये सरकारी बजट पे कोई हिसाब तक नहीं माँग पाता….आखिर में ठेकेदार वही बनते है जो विकास, विश्वास और आस्था के नाम पर लाखों डकारते है फिर उसी मंच पर बैठकर विकासवाद की बातें गढ़ते है।

ताज्जुब तो तब होता है जब ग्रामवासी नकाब पहने इन जूठे फरेबी लोगों से वाकिफ होकर भी अंधे बहरे बनकर मौन धारण करते है। जिसको ग्रामवासी तरजीह देकर थोड़ा आगे करते है वही आगे जाकर अपना हित साधकर दूसरों के कामों में रोड़ा अटकाता है। समय की कमी से जूझते इन ठेकेदारों का कद तो मोदी केबिनेट में बैठे मंत्रियों से भी बड़ा है। लेकिन वास्तव में सत्ता मोह केवल उनका भ्रम है यदि इन विकलांग ताकतों को उखाड़ कर फेंकना है तो सबको सच्च बोलने और लिखने की जुर्रत करनी होगी संकीर्ण मानसिकता से हर हाल में ऊपर उठना होगा वरना अपनों को ही सीढ़ी बनाकर उन्हें कुचलकर शिखर पर चढ़ने की जुग्गत में बढ़ते चलो।

19 oct 2019

 

सफरनामा

Screenshot_20190820-062709-1जब भी घर से दूर बड़े शहर के सफर में होता हूँ तो सदा साथ रहती है एक आस , एक उम्मीद…जो हर किसी को रहती है , सबसे भी और खुद से भी | इसी उम्मीद ने रिश्ते बना दिए और तोड़ भी दिए , इसी उम्मीद ने साँसों को थामे रखा और साँसों की डोर तोड़ भी दी | उम्र गुजर जाती है ,खुद को दिलासा दिए रहने में कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा , न वो वक्त कभी आता है ना सांसे उस वक्त के और इंतज़ार की मोहलत देती हैं |
अजब बेरोजगारी है इस उम्मीद की जो खत्म ही नहीं होती | रात आती है तो हजार सवाल लिए , क्या होगा -कैसे होगा -ना हुआ तो क्या होगा …….और भी ना जाने कितने बेसिर पैर के सवालों का पिटारा खुल जाता है ! सामने उम्मीद फिर अदालत लगा के बैठ जाती है , दावों -वादों और कहानियों की गवाही देती है। रात बीतने लगती है ,गवाह सब ऊंघते हुए सो जाते हैं |
दिन उग आता है, अपनी शाखाओं पर हजार उम्मीदों के फूल लिए…….. दिल आज भी इस इंतज़ार में है कि कभी तो मेहनत का सही मूल्यांकन होगा और मैं मेरी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा।
रात भर उम्मीदों और हकीकत की लड़ाई की कसमकस में उम्मीदें हार जाती है और सफर पूरा होता है और अन्ततः मैं उम्मीदों को गिरवी रख हकीकत के बाजार जयपुर में फिर से लौट आता हूँ।।

इम्तिहान और इंतजार

कॉम्पिटिशन एग्जाम का रिजल्ट देखने के बाद घरवालों को फ़ोन करके बताने में ह्र्दयगति 110-120 बीट/मिनट हो जाती है। घर पर सब कितनी उम्मीद से बैठे होंगे।

माँ सुबह से भगवान से प्रार्थना कर रही होगी, पिताजी भी ऊपर से भले झुंझला रहे हो पर अंदर ही अंदर उन्हें भी एक उम्मीद होगी की बेटा आज कुछ न कुछ तो बन ही जायेगा।

लेकिन आपकी सूखी आंखे और मासूम चेहरा देख वो समझ तो जाते हैं। पर तुम अंदर ही अंदर जानते हो कि जो आँसू तुम आज पी चुके हो उसका मोल रिश्तेदार और पडौसी किसी को समझने नहीं देंगे।

तुम जोर से रोना चाहते हो पर रोते नहीं हो यही असल में तुम्हारे लड़के से मर्द बनने की शुरुआत है। आज तुम भले ही दुखी हो पर आगे जाकर कहीं न कहीं इन्हीं लम्हों को सोचोगे, एक मुस्कराहट के साथ, दो ढलकते हुए आँसुओ के साथ इन्हीं लम्हों को चियर्स करोगे ।।

 

जज्बात

 

जब छत पर खड़ा होकर इस बड़े अनजाने शहर की सूरत को निहारता हूँ, तो अपने घर और अपनों से दूर खास वजह ओर मुकाम की लड़ाई फिर से जीवंत हो उठती है….

हां ये खुला आसमां ओर उसमें उड़ते धुएँ के गुबार जिंदगी की उलझनों और बदलती परिस्थितियों से परिचित करवा ही देते है, तो कभी बादलों में बिजली की गरज शहर में उठते शोर को शांत कर अपना कहर ढाह लेती है,

फिर बादलों की हल्की सी फुहार धधकती धरती पर फिर से ठंडी लहरें अवाप्त करती है और मौसम सुहावना हो उठता है,

ऐसा ही कुछ खेल हमारी जिंदगी में है हमारे आसपास का मौसम व परिस्थितिययां अपने अनुकूल जरूर होगी बस हमें बरसात के बादल बनने की जरूरत है, मतलब साफ है मैदान कोई भी हो वर्चस्व कायम हो सकता है, बस समर्पित होकर काम करने की जरूरत है ।।

हौसलों की उड़ान

भविष्य की उड़ान में हम फिर से उड़ेंगे आसमां की ऊंचाइयों में, हम पार करेंगे तम की गहराइयों को, हम चलेंगे एक ऐसी जगह जो वर्षों से सपना संजोए थे, हाँ हम छुं लेंगे रोशनी के उजाले को, अब आग से लड़ेंगे या तो जलेंगे या निखरिंगे,अब लडेंगे वजूद की लड़ाई के लिए, या मर के मिटेंगे, या मिटकर उकरेंगे ।।

बीते वक्त में सफलताओं और असफलताओं से गहरा नाता रहा है,जिंदगी की कोई जंग आखिरी तो नहीं हो सकती लेकिन ये लड़ाई वर्चस्व के लिए नहीं बल्कि वजूद के लिए है,खुद को साबित करने की लड़ाई,यहाँ प्रतिस्पर्धा भी खुद से और मेरे अपने वक्त से हैं ।।

बचपन

इंसान कितना भी आगे निकल जाये या बड़ा बन जाये एक जो चीज़ हमेशा उसे अपनी ओर खींचती है वो है ‘बचपन’ ये शायद ऐसी उम्र है जो जीवन भर साथ निभाती है।।

बचपन कभी लौट कर तो नहीं आता और न ही कैमरे में कैद मिलता है, सिर्फ यादों को कैद किया जा सकता है वो एक कलम के सहारे सिर्फ पन्नों पर।।
आज फिर बचपन की सैर करने और मन की बातें लिखने का मन हुआ तो यादें के बादल फूट पड़े…

गर्मियों में रेतीले धोरों में उड़ती धूल,आंधियों और लू की लपटों के बीच सूर्यदेव की तेज अग्नि भी हमें बिना चप्पलें पहने खेलने से रोक नहीं पाती थी।।
पूरा गाँव ही खेलने का मैदान था,वो घरों की दीवारें फांदना,एक छत से दूसरी छत पर दौड़ना तो महज है छोटी सी दौड़ लगती थी, गाँव की गलियाँ तो साइकिल का पहिया चलाते ही चंद मिनटों में नाप लेते थे।

कपड़ें से बनी वो गेंद न जानें कितनी खुशियों से वास्ता रखती थी, सर्दियों में सूर्य की पहली किरण से पहले गलियों में कंचे खेलना तो दिन में खण्डहरों में वो लिकाछूपी का खेल, थपी ,सतोलियाँ,और गिल्ली डण्डे का खेल खेलते कब सूरज ढल जाता था,कभी मालूम ही नहीं होता था।।

स्कूल में छुटी की पहली घण्टी बजते ही घर जाने की दौड़ में पहला नम्बर हासिल करने की वो प्रतिस्पर्धा घर की दूरियों को समेट लिया करती थी,स्कूल में आने वाले हर रविवार की ख़ुशी तो शायद स्कूल में छोड़ आये।।

स्कूल में स्वतंत्रता दिवस से पहले कपड़ों की पीतल के लोटे और अंगारों से इस्तरी की खुशी नये कपड़ें लेने से कम ना थी,स्कूल में पीटी परेड में शामिल होने की पहली रात तो नींद भी नहीं आया करती,वो खुशी और उल्लास शायद बचपन में ही गवां बैठे।।

बरसात में नंगे बदन बारिश की बूंदों के बीच भागना, रेत के घरोंदें बनाकर उन्हें घर मान लेते और अंगुलियों से उसी मिट्टी पर हल चलाकर उसे ही खेती मान लेते थे, कागज की नाव को पानी में चलाने की वो नाकाम कोशिशें, बरसात के बाद तालाब में दोस्तों संग नहाने का आनंद ऐसा लगता था जैसे कायनात ही कदमों में आकर लिपट गयी हो।।

फिर खेतों में मतीरा खाखडी का आनंद, खेजड़ी के खोखे, बेर,पीलू और पांके खाने का आनंद सभी फलों ओर मिठाइयों से बढ़कर था।। गाँव में आने अचार की गाड़ी के पीछे दोस्तों की टोली घण्टों सफर किया करती थी ।।

गाँव के पास लगने वाला मेला तो खुशियों का मेला था, घर में मेले में खर्चे के नाम से मिलने वाले दस बीस रुपये और दादाजी से मिले चंद सिक्के तमाम खुशियां खरीद लिया करते थे, मेले में रंग बिरंगी गुल्फ़ीयाँ खाने का आनंद तो कभी भूल ही नहीं सकते ।।

दोस्तों संग नाराजगी,लड़ाई-झगड़ा तो हमेशा हुआ करता था जो कुछ ही पलों में भूला देते थे, शायद यही भूलना और भूलाना ही बचपन था।।
आज हम बड़े हो गए,उम्र बढ़ गयी है हालात बदल गए हैं वो खयालात कहीं पीछे रह गए है मगर यादें फिर भी ताजा है।।

“झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे हम

ये उन दिनों की बात जब बच्चे थे हम”

पद्मावती

मैं कलमकार तो नहीं हूँ लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी नाम के तांडव पर कुछ लिखने को मजबूर हूँ,आज अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं इतनी विस्तृत हो गयी है की इतिहास को नंगे नाच से जोड़कर पैसे जोड़ने का काम हो रहा है,ऐतिहासिक तथ्यों को ग्रन्थों और इतिहासविदों के बजाय फिल्मकार प्रमाणित कर रहे है,मैं बात कर रहा हूँ फ़िल्म ‘पद्मावती’ की…..फ़िल्म पद्मावती पर सबने सुर्खियां बटोरीं है यदि घाटा हुआ है,तो सिर्फ आम राजपूत को,राजपूताने के इतिहास और राजपूताने की गौरवमयी छवि को….।।

कितनी राजनीति हो रही है….सब अपनी-अपनी दुकान जमाने में लगे है,किसी को कोई बात नहीं कचोटती सिर्फ दिखावा करके राजपूतों की भावना से खेला जा रहा है।।

BJP ने बड़ी होशयारी से राजनीति खेली,गिने चुने नेताओं से बयान दिलाए कार्यवाही के नाम से हमें ठगा गया,स्मृति ईरानी के बयान के बाद बाकी बड़े नेताओं की जैसे जबान ही काट ली हो। फिर गुजरात को देखकर नेताओं को होश आया। योगी जी ने अपने अंदाज के अनुसार ही बोले और काम किया,प्रखंड हिंदूवादी। मामा शिवराज का भी जोश जाग उठा। राजस्थान की महारानी मेडम ने भी जख्मों पर मरहम लगाने के प्रयास किया,लेकिन बहुत देर लगा दी हिम्मत करने में । फिर रूपानी जी को भी रोक लगाने का आदेश मिला चुनावों के मद्देनजर……और यही BJP गुजरात चुनावों के बाद लोकतंत्र का सहारे लेते हुए फिर धोखा करेगी।।

RSS, शिवसेना और काफी धर्म के ठेकेदार और फिल्मी हस्तियों के असली चेहरे जरूर सामने आए है और कुछ ढोंगी नेताओं की भी पहचान हो गयी। भाई चन्दा सबको चाहिए, विरोध करके क्या मिलेगा ??
धर्म के नाम पर अपने को तो ऐशोआराम करना है,हिंदुत्व तो हमारी दुकान है, दुकान चलाने के लिए तो भड़काऊ बोल बोलने है,वो वोट आएंगे तब बोलेंगे। अम्बानी और भंसाली ने क्या बिगाड़ दिया हिंदुत्व का ?? अगर किसी और ने अपनी अभिव्यक्ति की आजदी ज्यादा दिखा दी तो उसे देशद्रोही करार दे देंगे ,आखिर सरकार भी अपनी ही है,कोई बोल के ही दिखाए हिंदुत्व के बारे में ,ये है हिंदूवादी संगठनों की ताकत…।।

बाकी बचे मीडिया जगत और पत्रकारों ने भी राजपूतों पर कीचड़ उछालने में कोई कमी नहीं रखी…TV डिबेट में उन्हीं राजपूत नेताओं को बुलाया जाता जो बिना तथ्य आए और भड़काऊ बयान देवे जिससे राजपूतों को एक बार फिर क्रूर,अत्याचारी दिखाया जाए,बिकाऊ मीडिया वाले राजपूती नीलाम करने में लगे हुए थे ।।

रही बात करणी सेना की……करणी सेना ने अपनी छवि शिव सेना की तरह तेज तर्रार और माफियाई पार्टी की बनाई और साथ ही साथ सारे भारत में समुदाय विशेष कट्टर पार्टी का उदय हुआ और आगे की राजनीतिक दुनिया में अपने पैर जमाने में नीवं का पत्थर डालने में सफल हुई। कालवी साहब को भी समाज का नेता और बोलने के लिए मंच मिल गया ।।
लेकिन जब तक करणी सेना के दो धड़े एक साथ नही होंगे तब तक समाज को कोई फायदा नहीं होने वाला,दोनो ही समाज के नाम पर अपनी राजनीति चमकाएंगे।।

करणी सेना को सम्पूर्ण भारत के राजपूतों की बागडोर हाथ जरूर लगी,नेतृत्व भी अच्छा किया फिर भी महिपालसिंह मकराना और कुछ ओछे नेताओं के बयानों ने राजपूतों की छवि को ज्यादा धूमिल किया।।

रही बात भंसाली की उन्होंने तो मास्टर स्टॉक ही खेला 2-3 थप्पड़ों के बदले इतिहास में फ़िल्म का नाम लिखवाने चले है,फ़िल्म का बिना पैसे लगाए इतना प्रचार हुआ है की अब 2-3 राज्यों में रोक भी लगे तो भी फ़िल्म को Blockbuster होने से कोई रोक नहीं सकता।

आखिर सबने रोटियां सेकी है,रहे तो आम राजपूत जिन्होंने बिना फायदा देखे कई आपराधिक केस लेकर भी इस लड़ाई में जान फूंकी,यदि ये लड़ाई कुछ दिनों तक ऐसे ही चलती तो बहुत से लोग कानून के दायरे और खादी के कुर्ते पहने नेताओं से अपने आप निपट लेते,लेकिन नेताओं को अपनी फिक्र सबसे ज्यादा है इसलिए ऐसा हुआ नहीं और होगा भी नहीं…।।

फ़िल्म थोड़ी से एडिटिंग के बाद जरूर आएगी,यदि ज्यादा विरोध रहा तो 2-3 राज्यों में रोक लगेगी,अभीे तो सिर्फ गुजरात चुनाव का इंतज़ार है,फिर BJP को भी अनुशासन और लोकतंत्र याद आएगा।।

आखिर नारी शक्ति और मान मर्यादा की लड़ाई में राजपूतों के साथ आज भी सर्व समाज दिखा, सबने पुरजोर से समर्थन किया ,एक बात तो साफ है आज भी राजपूतों पर लोगों का विश्वास कायम है और हमें इसे बरकरार रखना होगा।।